रुद्रपुर। भाकपा(माले) नगर सचिव अमनदीप कौर एडवोकेट ने प्रेस को दिए बयान में कहा कि मोदी सरकार ने पिछले कार्यकाल में विपक्ष के सभी सांसदों को संसद से निष्कासित करने के बाद संसद में बिना चर्चा व बहस के बाद तीन जनविरोधी कानून को पास कर दिया था। इन कानूनों को लाने की प्रक्रिया ही तानाशाही भरी है।
दरअसल मोदीराज में बेरोजगारी, महंगाई, शोषण से तंग आकर लोग समस्याओं के समाधान हेतु सड़को पर आकर आवाज उठा रहे हैं। इन आवाजों को कुचलने के लिए मोदी सरकार ने नागरिकों के मूलभूत अधिकार जैसे बोलने, एकत्र होने , किसी के साथ जुडने, प्रदर्शन करने आदि को अपराध की श्रेणी में लाई है। इन कानूनों में क्रूर यूएपीए से “आतंकवादी कृत्य” की विस्तारित परिभाषा ली गयी है, नए नामकरण के साथ कुख्यात राजद्रोह कानून ( भारतीय दंड संहिता- आईपीसी की धारा 124 ए) को कायम रखा गया है और भूख हड़ताल को भी अपराध बना दिया गया है।
उन्होंने कहा कि इन कानूनों में पुलिस को अनियंत्रित शक्तियां दे दी गयी हैं, जिनका देश में नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. गिरफ्तारी के लिए बचावों का अनुपालन किए बगैर पुलिस को व्यक्तियों को निरुद्ध करने का कानूनी अधिकार दे दिया गया है. बिना अपराध सिद्ध हुए आरोप भर लगने से आरोपी की फोटो व उसकी डिजिटल पहचान थाने में लगाना अमानवीय है।
उन्होंने कहा कि फ़ौजदारी मामलों का जबरदस्त बैकलॉग (3.4 करोड़ मुकदमें लंबित) है, उसके बीच में इन तीन क़ानूनों को लागू करना, दो समानांतर कानूनी व्यवस्थाएं उत्पन्न करेगा, जिससे और बैकलॉग बढ़ेगा तथा पहले से अत्याधिक बोझ झेल रहे न्यायिक तंत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत के न्यायिक ढांचे को सुधार की अत्याधिक जरूरत है. लेकिन ये कानून और ज्यादा विसगतियां व दमन–उत्पीड़न का औजार साबित होंगे।
साथ भी एडवोकेट्स और प्रशासनिक मशीनरी के समक्ष भी अध्ययन व व्याख्या के मसले पर कई चुनौतियां व मुश्किलें पैदा होंगी।
इसलिए इस कानून को रोका जाना जरूरी है। इसके लिए हमारे वकीलों के संगठन ऑल इंडिया लायर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका भी दाखिल की है और पार्टी के सांसदों कॉमरेड राजा राम सिंह व सुदामा प्रसाद ने भी राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया है।
